Democracy,  Essays

नफरत की राजनीति जनता के लिए आकर्षक क्यों है?

द ग्रॅजुएट इंस्टिट्यूट जेनेवा

अल्बर्ट हिर्शमैन सेंटर ऑन डेमोक्रेसी

ऊपरी पायदान के ऐलीट का लोकतंत्र के खिलाफ विद्रोह

वैश्वीकरण के एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सिद्धांतकार और न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में मीडिया, संस्कृति और संचार के गोडार्ड प्रोफेसर अर्जुन अप्पादुरई, 2017 में अल्बर्ट हर्शमैन सेंटर ऑन डेमोक्रेसी के उद्घाटन के बाद उसके द्वारा आमंत्रित पहले विजिटिंग प्रोफेसरों में शामिल थे। “जमीनी लोकतंत्र” पर उनके प्रभावशाली लेखन ने तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में लोकतांत्रिक प्रथाओं पर आधारित सेंटर के अनुसंधान कार्यक्रम को आकार दिया है। ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट में “ग्लोबल स्विंग टू द राइट | दक्षिणपंथ की ओर दुनिया का झुकाव ” पर अर्जुन अप्पादुरई के सार्वजनिक व्याख्यान की एक रिकॉर्डिंग दुनिया भर में सत्तावादी लोकलुभावन नेताओं और आंदोलनों के हालिया उदय का विश्लेषण करती है। केंद्र के तत्वावधान में, यह विडिओ लेक्चर हमारे मल्टीमीडिया संसाधनों के तहत उपलब्ध है । “द रिवाल्ट ऑफ द एलाइट्स” पर उनका नया अंश दुनिया के विभिन्न हिस्सों में “नए” अभिजात वर्ग, जिन्होंने लोगों के नाम पर लोकतंत्र के खिलाफ विरोधाभासी रूप से विद्रोह किया है, के राजनीतिक कार्यक्रमों का एक निर्णायक विश्लेषण है। यह उस अभिजात वर्ग की सामाजिक संरचना का विश्लेषण करता है जिन्होंने कारण के बजाय प्रभाव का उपयोग करके एथेनोफोबिया के अपने संदेश को जन-जन तक पहुंचाया और चुनावी राजनीति पर कब्जा कर लिया है। इससे यह भी साफ हो जाता है की यह नफरत की यह राजनीति जनता के लिए आकर्षक क्यों है।

ऑरटेगा वाई गैसएट 20वीं सदी के एक विचारक, एक अपरंपरागत स्पैनिश दार्शनिक हैं, जिनका सामाजिक विज्ञान पर सबसे महत्वपूर्ण कार्य द रिवल्ट ऑफ़ द मास”, एक ऐसी दुनिया के बारे में उन्की आशंकाओं को प्रतिबिंबित करता है जिसमें उदार व्यक्ति गायब हो रहे थे और “मास मैन” उभर रहा था। ओर्टेगा के मास मैन का विचार गरीबों, निराश्रितों या सर्वहारा वर्ग को अंकित नहीं करता बल्कि उन औसत पुरुषों को अंकित करता है जो अपने फैलाव के बजाय अपने स्वाद, प्रस्तावों और मूल्यों में एक समान और मिलते-जुलते हैं। इस तरह ओर्टेगा फ्रैंकफर्ट स्कूल के सामाजिक आलोचकों की तुलना में, “ग्रे फलालैन सूट” वाले, बाद के अमेरिकी आलोचकों के करीब थे । फिर भी किसी भी तरह की जनता को उन्नीसवीं सदी के उदारवादी आदर्शों के खिलाफ विद्रोह करते हुए देखने वाली ओर्टेगा प्रारंभिक लोगों में से एक थे।

मैं अब ओर्टेगा पर लौटता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि 20वीं शताब्दी ने बड़े पैमाने पर विद्रोह के प्रमुख रूपों को समाप्त कर दिया है और हमने एक नए युग में प्रवेश किया है जिसकी विशेषता है “कुलीनों का विद्रोह”। ये विद्रोही कुलीन वे लोग हैं जो मोदी, ट्रम्प, एर्दोगन, बोल्सनारो, जॉनसन, ओर्बन और कई अन्य लोगों के नए आटोक्रैसी का समर्थन करते हैं, घेरते हैं, बढ़ावा देते हैं। इनके संश्लेषण को ऊपर से लोकलुभावनवाद कह सकते हैं जहां अवाम, खुद हीं, वह चुनावी उपकरण बन जाती है जिसकी मदद से हैं जनतंत्र को तबाह किया जा रहा है।

नए लोकतांत्रिक अभिजात वर्ग के इस व्यवहार को प्रीडेटरी कैपिटलिस्म, क्रोनिसम, नव-उदारवाद या नवीनतम छद्मावरण डिजैसटर कैपिटलिस्म के बजाय “विद्रोह” क्यों कहा जाए? ये नए कुलीन कौन हैं और वे किसके खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं?

सबसे पहले, वे उन सभी अन्य कुलीनों के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं जिनसे उन्हें नफरत, घृणा और भय है। इसमे उदारवादी कुलीन वर्ग, मीडिया कुलीन वर्ग, धर्मनिरपेक्ष कुलीन वर्ग, हार्वर्ड के कुलीन, वासप कुलीन वर्ग, पुराने आर्थिक कुलीन, बुद्धिजीवी, कलाकार और शिक्षाविद शामिल हैं। ये श्रेणियां एक तालाब की तरह हैं जिसमें से विभिन्न राष्ट्रीय लोकलुभावन सरकारें उपयुक्त राष्ट्रीय और सांस्कृतिक शब्द चुन लेतीं हैं। तो, यह एक ऐसा अभिजात वर्ग है जो अभिजातवाद के विरोधी के रूप में अपने अभिजात वर्ग को प्रच्छन्न करता है।

दूसरा, यह विद्रोह उन सभी लोगों के खिलाफ है जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने असली कुलीनों को धोखा दिया और अवैध रूप से सत्ता पर कब्जा कर लिया। इनमें अमरीकी अश्वेत; भारत में मुसलमान और धर्मनिरपेक्षता वादी; ब्राज़ील में वामपंथी और समलैंगिक; रूस में असंतुष्ट लोग, एनजीओ और पत्रकार; तुर्की में धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अल्पसंख्यक; यूनाइटेड किंगडम में प्रवासी, श्रमिक और संघवादी शामिल हैं। यह उन लोगों द्वारा विद्रोह है जो सोचते हैं कि वे सच्चे कुलीन हैं और वे उन लोगों के खिलाफ जिन्हें वे सत्ता दखल करने वाले झूठे कुलीन मानते हैं।

तीसरा, इन नए कुलीनों का विद्रोह उन जंजीरों के खिलाफ है जो उन्हें उदार लोकतंत्र से बांधे हुए है। वे अपने लिए छोड़कर, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व से घृणा करते हैं। वे चेक और बैलेंस को बिना संयम के कार्य करने की अपनी स्वतंत्रता पर नाजायज प्रतिबंध के रूप में देखते हैं और इसलिए उससे से नफरत करते हैं । वे विशेष रूप से कॉरपोरेट विशेषाधिकारों पर किसी भी प्रकार के नियमन से घृणा करते हैं, नियमन को वे पूंजीवाद के खिलाफ एक साजिश के रूप में देखते हैं और इसलिए उसे अपने निजी अधिकार क्षेत्र में रखना चाहते हैं। और इन सबसे ऊपर उन्हें विचार-विमर्श और प्रक्रियात्मक तर्कसंगतता से नफरत है क्योंकि इसमें सुनना, धैर्य रखना और सामूहिक बुद्धि का इस्तेमाल करना शामिल है। उनके मित्रों द्वारा विधायिका और न्यायपालिका को नियंत्रित करने को छोड़ कर वे शक्तियों के पृथक्करण में भी विश्वास नहीं करते।

इसका सबसे सरल रूप में आशय यह है की इन नए कुलीनों का विद्रोह लोकतंत्र के खिलाफ है, लेकिन विडंबना यह है कि यह विद्रोह लोगों के नाम पर हीं किया जाता है। दूसरे शब्दों में “आधुनिक लोगों की परिकल्पना” से लोकतंत्र पूरी तरह अलग हो गया है। यह एक विद्रोह है (इस अर्थ में कि सत्ता को जब्त करने के लिए विप्लव हमेशा विद्रोह होता है) लेकिन क्रांति नहीं; लेकिन इसका भी उद्देश्य राजनीति या अर्थव्यवस्था में मौलिक परिवर्तन लाना है। यह विद्रोह एक अभिजात वर्ग द्वारा दूसरे को हटा कर खुद को पदस्थापित करने का प्रयास है।

यदि हम कुछ समाजशास्त्रीय प्रश्न न पूछें तो यह सब सामान्य और ऐतिहासिक रूप से परिचित हीं लगेगा। इस नए अभिजात वर्ग की प्रकृति क्या है? इसमें प्रवेश की शर्तों को कौन परिभाषित करता है? इसका पक्षधर कौन है? इसकी सामाजिक जड़ें क्या हैं? इन प्रश्नों से हमारा ध्यान शीघ्र हीं चुनिंदा राज्यों और विशिष्ट समाजों पर केंद्रित हो जाता हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के मामले में ट्रम्प जिस अभिजात वर्ग के लिए बोलते हैं वे उनके जैसी पृष्ठभूमि से हीं आते हैं। वे अधिक शिक्षित नहीं हैं, वे घुमंतू उद्यमी या राजनेता रिपब्लिकन सीनेट के सत्तारूढ़ मैल हैं जो सदन में रिपब्लिकन पक्ष के हैं। इसके अलावा इनमें दिखावे वाले या नव-फासीवादी सीईओ (पीटर थिएल जैसे सिलिकॉन वैली आइकन सहित) टेलीविजन और रेडियो मीडिया का विशाल बहुमत और नस्लवादी, लालची ईवैन्जेलिकल पादरी, चर्च और उन्हें दान देने वालों का व्यापक नेटवर्क शामिल है। इनमें प्रमुख दक्षिणपंथी थिंकटैंकों के कैरियरवादीयों को भी शामिल किया जा सकता है। बिना किसी भी स्पष्ट सांस्कृतिक जड़, हैसियत या इतिहास वाले इस कुलीन वर्ग के नेटवर्क के मूल में फ़ेडरलिस्ट सोसाइटी जैसे गुप्त नेटवर्क हैं जिनका जुड़ाव ओपस देई जैसे ट्रांसनैशनल समूहों के साथ संबंध है। ये अवसरवादियों, लालचियों और मुनाफाखोरों का नेटवर्क है जिसका कोई अन्य पारंपरिक संबंध या मूल्य नहीं है।

भारत में वर्तमान शासन के अभिजात वर्ग को भी समान रूप से चित्रित किया जा सकता है जो चुनावों को छोड़कर हर लोकतांत्रिक संस्था के प्रति अवज्ञाकारी ​​है। यह आधे पढ़े-लिखे अर्थशास्त्रियों, करियर ठगों और बहुचर्चित व्यावसायिक टाइकूनों से बना है जो एकाधिकार, पैरवी, सीधे-सीधे भ्रष्टाचार और आपराधिक नेताओं और विधायकों के नए बेशर्म वर्ग के जरिए काम करता हैं। इस अभिजात वर्ग का विद्रोह नेहरूवादी समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और बहुलवाद से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति या समूह के खिलाफ है। यह एक ऐसा अभिजात वर्ग है जो मानता है कि हिंदू दक्षिणपंथी (उनका अपना क्लब) मुगल, ब्रिटिश और कांग्रेस शासन के लंबे समय के बाद जागने वाला भारतीय इतिहास का स्लीपर-सेवीयर है जो वास्तविकता में मुस्लिम-विरोधी विचारधाराओं, नीतियों और पोग्रम से गढ़ा गया है। इस विद्रोही अभिजात वर्ग के पास राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा के साधनों पर उनकी पकड़ को छोड़कर कोई वास्तविक वर्ग-एकता नहीं है । ट्रम्प के कुलीन साझेदारों की तरह हीं यह भी अवसरवादियों का एक अभिजात वर्ग है जो हर प्रकार के भागीदार संस्थाओं के लिए अवमानना का भाव रखता है।

हालाँकि मुझे एर्दोगन, या पुतिन या बोल्सनारो, या डुटर्टे के चालक दल और पालतू जीवों के सामाजिक मूल बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है पर मैं इसे अनुमानित करने के लिए तैयार हूं कि इन विद्रोहियों में से प्रत्येक का प्रोफ़ाइल ट्रम्प और मोदी के समर्थकों के समान हीं है: पारंपरिक सांस्कृतिक और सामाजिक अभिजात वर्ग के खिलाफ असंतोष, उदारवादी प्रक्रियावाद के लिए अवमानना, बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों, कलाकारों, कार्यकर्ताओं, समाजवादियों, नारीवादियों के प्रति घृणा, पूंजीवाद के लिए प्रशंसा केवल जब तक यह केवल उनके पक्ष में विनियमित हो और लोकतंत्र के प्रति घृणा के साथ साथ (लोगों के बजाय) मतदाताओं की उनकी साधना। विक्टर ओर्बन ने हाल में हीं हंगरी में अपनी शाश्वत और पूर्ण शक्ति की घोषणा की है; ट्रम्प ने कोविड राहत जांचों में उनके नाम को छापने की आवश्यकता जताई है और कहा है कि वे वर्तमान संकट में मन मुताबिक आपातकालीन शक्तियों का उपयोग कर सकते हैं; मोदी कमोबेश खुद को भारत के संविधान से ऊपर घोषित कर चुके हैं साथ हीं सार्वजनिक तौर पर बोलसनारो, ट्रम्प और नेतन्याहू के साथ खड़े हैं और कोविड संकट का उपयोग भारत में कर्फ्यू, पुलिसिया गुंडागर्दी , झूठे कारावास और सामान्यीकृत दमन की नीतियों का विस्तार करने के लिए कर रहे हैं। इन सभी चालों में ये नेता सहानुभूति और सहयोग करने वालों के एक नेटवर्क पर भरोसा करते हैं जो मानते हैं कि अगर वे सर्वोच्च नेता का अनुपालन करते हैं तो वे कामयाब होंगे।

इस प्रकार अगर हम दुनिया के कई नए लोकलुभावन निरंकुश सरकारों की विशेषता देखें तो वे “ऊपर से लोकलुभावन” अभिजात वर्ग हैं जो कुलीनों के खिलाफ उदार लोकतंत्र द्वारा विद्रोह करते हैं, तो हम उनके अनुयायियों, उनके मतदाताओं और उनके आधार, अर्थात उन “लोगों” को किस रूप में देखें जिनके नाम पर और जिनकी सहमति से वे कई लोकतांत्रिक संरचनाओं, मूल्यों और परंपराओं को तोड़ रहे हैं?

इस सबसे परेशान करने वाले प्रश्न के कुछ परिचित उत्तर हैं। पहला यह है कि ये आटोक्रेट भावनाओं (प्रेम, हानि, बलिदान, घृणा, क्रोध) को प्रभावित करने वाले उपकरण समझते हैं और उनका वैसा हीं उपयोग करते हैं जबकि उनके विरोधी विलुप्तप्राय अवधारणाओं और मानदंडों के अर्ध-शैक्षणिक तर्कों के समुद्र में डूब गए हैं। दूसरा यह है कि आकांक्षा की प्रौद्योगिकियों (विज्ञापन, उपभोक्तावाद, वस्तुओं, सेलिब्रिटी कल्ट, कॉरपोरेट विंडफॉल) के वैश्विक उदय के बारे में कुछ ऐसा है जिसने गरीब और सब-अलटर्न वर्गों को, उदारवादी विचारशील प्रक्रियाओं की सुस्ती के साथ, अधीर बना दिया है। वे “अभी और इसी वक्त” समृद्धि और गरिमा चाहते हैं और ये नेता उन्हें यह दिलाने का वादा करते हैं। एक और तर्क यह है कि निम्न वर्ग बहिष्कार, दुर्बलता और अपमान से इस कदर तंग आ चुका है की वह अपने को अपने शिकारी नेताओं (जो जिस चीज को चाहते हैं, हड़प लेते हैं) के साथ पहचान करने लगा है और इनके एथेनोफोबिया (मुसलमान, शरणार्थी, चीनी, जिप्सी, यहूदी, प्रवासी और इसी तरह अन्य समूह) से ग्रसित होने की संभावना कहीं अधिक हैं। ये सभी तर्क किसी न किसी राष्ट्र के संदर्भों में कुछ अर्थ रखते हैं।

लेकिन मेरे सुझाव में ऑरटेगा वाई गैसएट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी अंतर्दृष्टि से हमें यह देखने में मदद मिली कि हम एक युग की शुरुआत में हैं जिसमें जनता के विद्रोह पर कब्जा कर उसे अभिजातियों के विद्रोह द्वारा विस्थापित कर दिया गया है। इस कब्जे के बारे में सबसे अधिक परेशान करने वाली बात, जिसका निरंकुश होकर चुनावों का लगातार इस्तेमाल होता है, वह यह है कि जनता (जो कोई भी हो सकती है) को विश्वास हो गया है कि नए कुलीनों का विद्रोह वास्तव में उनका अपना विद्रोह है, और अब केवल अपने शैतानी नेताओं को खुश (और यदि संभव हो तो अनुकरण) करना है जो उन्हें वास्तविक विद्रोह की तुलना में चीजों को जल्दी ठीक करने की पेशकश करते हैं। दूसरे तरीके से कहा जाए तो नए चुनावी जनसमूह को लगने लगा है कि उनके नेताओं के शिकार का लाभ जल्द ही उन्हें भी मिलेगा। इस चाल की मुख्य बात यह है कि गरीब और उप-वर्ग कुकर्मी अब खुद से कमजोर तबके को नपुंसकता से अपमानित कर सकते हैं, बलि चढा सकते हैं और मार सकते हैं। रोजगार, स्वास्थ्य, उच्च आय और सुरक्षित शहरों जैसे मामूली लाभ के रिस कर पिरामिड के तल पर के लोगों तक पहुंचे, उसमें अभी समय है। अगर नफरत उन तक रिस कर पहुँच सकती है, तो शायद समृद्धि भी।

अर्जुन अप्पादुरई न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में मीडिया, संस्कृति और संचार के गोडार्ड प्रोफेसर और द हर्टी स्कूल (बर्लिन) में मानव विज्ञान और वैश्वीकरण के प्रोफेसर हैं। वह इरास्मस विश्वविद्यालय, रॉटरडैम में मीडिया और संचार विभाग में मानद प्रोफेसर, टाटा इंस्टीट्यूट फॉर सोशल साइंसेज, मुंबई में चेयर प्रोफेसर और मैक्स-प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर रिलीजियस एण्ड एथनिक डाईवरसिटी, गोटिंगेन में वरिष्ठ शोध सहयोगी के रूप में कार्य करते हैं। अप्पादुरई मुंबई के शहर के लिए उन्मुख एक गैर-लाभकारी संगठन PUKAR (पार्टनर्स फॉर अर्बन नॉलेज एक्शन एंड रिसर्च) के संस्थापक और अध्यक्ष हैं। उनके सबसे महत्वपूर्ण प्रकाशन हैं: द फ्यूचर फ़ॉर ए कल्चरल फैक्ट: वैश्विक स्थिति पर निबंध (2013), इंडियाज़ वर्ल्ड: एक वैश्विक समाज में रचनात्मकता की राजनीति (2012), माडर्निटी एट लार्ज: वैश्वीकरण के सांस्कृतिक आयाम (1996)।

Date Written: 17-04-2020
Author: The Graduate Institute Geneva
Translation: Surya Kant Singh
Title: The Revolt of the elites
First Published: The Graduate Institute Geneva

Author is a voracious reader and an autodidact. He is studying Statistics and Philosophy and works as an Analytics Consultant. He has published columns on Public Policy, Governance, Politics, Economics and Philosophy among others. When in leisure he listen's to 70's rock and engage in pro-people talk. He can be contacted on surya@columnist.com

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