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अर्थार्थ : डांसिंग… प्लेइंग… लिंचिंग?

हमारी संस्कृति का ताना-बाना पूरी तरह धर्म के इर्द-गिर्द बुना हुआ है। कई मायनों में यह जुड़ाव इस हद तक है कि धर्म और संस्कृति का भेद न के बराबर है। देश की सेना दिवंगत जवानों को श्रद्धांजलि दिये बिना युद्ध के मैदान में नहीं उतरती, वैज्ञानिक पद्धतियों से बनी फैक्टरी बिना परमात्मा को याद किये शुरू नहीं की जाती और इसी देश में व्यक्ति का धर्म पूछ कर उसे लिंच कर दिया जाता है! दी गई तीनों घटनाएं हिंदू धर्म के अंगों का सटीक उदाहरण हैं। दिवंगत जवानों को श्रद्धांजलि देना- आध्यात्म का; नए काम को शुरू करने से पूर्व परमात्मा को याद करना- संस्कृति का और व्यक्ति का धर्म पूछ कर उसे मार दिया जाना- हिंदुत्व का।

जब किसी भी शुभ-अशुभ घटना के कारण को संस्कृतियां समझ नहीं पाईं तो उसे अपने से ऊपर की किसी ताकत से जोड़ दिया। अधिकतर प्राचीन सभ्यताओं में धर्म अत्यंत निजी विषय के रूप में शुरू हुआ। धर्म के इस विशुद्ध स्वरूप का सीधा सम्बंध चेतना से था। इन सभ्यताओं में ज़्यादा चैतन्य पुरुष शमन के रूप में सम्मानित हुए और इस तरह धर्म में अनुक्रम की शुरुआत हुई। हमारी आदिम जनजातियों में आज भी धर्म का स्वरूप बहुत ज़्यादा नहीं बदला है। धर्म उस वक़्त तक लाभ से नहीं जुड़ा था। बस यह था कि ईश्वर से पहले एक मध्यस्थ आ चुका था। चाहे शमन हों या ऋषि-मुनि, उनके बारे में प्रचलित है कि वे नियमपूर्वक जीते हुए आरोग्य प्रदान करते थे और राजा-प्रजा को नैतिक मार्ग पर भी रखते थे।

असल समस्या तब से उत्पन्न हुई जब धर्म के राजतंत्र पर होने वाले असर को समझा जाने लगा। तब धर्म के मौजूदा संस्थागत रूप का उदय हुआ। राजनीतिक फायदे ने धर्म को मानव जीवन से ज़्यादा मूल्यवान बना दिया और धर्म को आधार बना कर हिंसा होने लगी। इस दौर में किये गये युद्धों के व्याख्यानों को “चरम मानव क्रूरता की गाथाएं” कहना अतिशयोक्ति न होगी। इनका ज़िक्र इसलिये क्योंकि ऐसे ही कुछ किस्से न्यू इंडिया में भी लिखे जा रहे हैं। धर्म क्या है इस पर कई तरह के मत हैं, लेकिन ये सारे मत इस बात से एकाकार हैं कि धर्म को सही मार्ग होना चाहिए। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2002 के गुजरात दंगों के दौरान ‘राजधर्म’ का पालन करने को कहा था। राजधर्म अर्थात शासन करने वाले का सही मार्ग। इस तरह महाभारत भी धर्मयुद्ध अर्थात सही मार्ग का युद्ध था।

“हिंदु” शब्द दरअसल सनातन धर्म के मुकाबले काफी नया है और उच्चारण की गलती से उत्पन्न हुआ है। फारसी उच्चारण में सिंधु, हिंदु हो गया जिसका पहला लिखित प्रमाण ज़ेंड-अवेस्टा में मिलता। वहां इसे सिंधु घाटी  (स्थान) के लिए प्रयुक्त किया गया है न कि धर्म के लिए। इस तरह हिंदु धर्म का शाब्दिक अर्थ निकलता है सिंधु घाटी में रहने वालों का सही मार्ग। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंदु धर्म के लिये सही शब्द “सनातन” ही है। हिंदु धर्म का सनातन होना उसके आसानी से आकार बदलने के स्वभाव में निहित है। यहां विविधताओं से भरे समाज में से हर एक के लिये कुछ न कुछ है। आप मांस खाते हैं? कोई बात नहीं; नहीं खाते? उत्तम! पूजा-पाठ नहीं करते तो कोई बात नहीं, करते हैं तो उत्तम। उपवास की तिथि से लेकर इष्ट देवता के चुनाव तक में भरपूर आज़ादी है यहां। इसका पालन सुलभ है साथ ही इसमें जगह-जगह अध्यात्म के गुण भी छिपे हैं।

भारतीय आस्तिक मान्यताओं में क्रमशः छह दर्शनों का ज़िक्र है– मीमांसा, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग और वेदांत। इनके मूल साहित्य के काफी अंश आसानी से उपलब्ध हैं। नामी-गिरामी धर्म के व्यापारी इन्हीं के अंश उठाकर मधुर व्याख्यान कर देते हैं और हम-आप उनकी समझ के आधार पर अपनी समझ विकसित करते हैं, वह भी भारी दान देने के बाद! योग के उत्तम मार्ग में आठ अंग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) हैं जिनका उल्लेख महर्षि पतंजलि के श्लोकों में मिलता है। इस कारण इसे अष्टांग योग भी कहते हैं। उत्तम इसलिये क्योंकि यह आपके जीवन को पूरी तरह आपके हाथों में दे देता है। इस मार्ग पर चलते हुए आप अपनी प्रगति को स्वयं आंक सकते है। यह पूरी तरह वैज्ञानिक है और हर कदम पर साक्ष्य भी देता है पर कर्मकांडी (सांस्कृतिक) मार्ग की तरह इसमें सुलभता नहीं है। यह आपसे स्वाध्याय और अडिग हो कर नियमों का पालन करने की उम्मीद करता है और इसलिये सन्यासियों द्वारा ही इसका पालन सम्भव है। कर्मकांडों और संस्कृति में हर जगह योग के बीज हैं। यह और बात है कि उसको बिना समझे हडबड़ी में निपटा दिया जाता है।

किसी भी धर्म से जुड़े अधिकतर लोग यही मानते हैं कि उनका धर्म अच्छे-बुरे वक़्त में उन्हें सही राह दिखाता है। तो किसी निहत्थे इंसान को मार दिया जाना किस रूप में धर्म से जुड़ा हो सकता है? यहां माइनॉरिटी या मैजोरिटी शब्द का उपयोग बेईमानी है। यह सीधे-सीधे हिंदु बनाम मुस्लिम है। और भी सीधे शब्दों में हिंदुओं द्वारा मानवता पर किया जा रहा अपराध! हिंदु पहचान के साथ हिंदु इतने सशक्त हो कर जीते हैं कि दूसरे धर्म के लोगों पर इसका असर नहीं देख पाते। ठीक उसी तरह जिस तरह मछली को पानी के होने का आभास नहीं होता। इस बारे में कुछ निजी अनुभव हैं जो साझा करना चाहूंगा।

मेरे गृहराज्य झारखंड के देवघर में बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग है। किंवदंतियों के अनुसार यह वही शिवलिंग है जो रावण द्वारा कैलाश से लंका ले जाया जा रहा था। यहां पर सदियों से श्रावण मास में मेले का आयोजन होता रहा है। कांवरिये भागलपुर के सुलतानगंज से गंगाजल भर कर 108 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर बाबा बैद्यनाथ को चढ़ाते हैं। 2012 में पहली बार श्रावणी मेले के दौरान जल ले कर मैं पैदल चला। सुलतानगंज में मुस्लिम आबादी ठीक-ठाक है। जब डेढ़ लाख भगवाधारी हिंदु “प्रतिदिन” किसी मुस्लिम बस्ती से गुज़रते हैं तो वहां रह रहे दाढ़ी-टोपी वाले मुसलमान के मन में उपजे भय की बस कल्‍पना ही की जा सकती है। तब पहली बार हमारे द्वारा दूसरों पर ढाये जा रहे इस कहर का अहसास हुआ। यह समय था जब “हिंदू भारत” की परिभाषा आकार लेने लगी थी। उसी वर्ष दुर्गापूजा के अष्टमी की शाम मित्र के घर जा रहा था। किसी भी उत्तर भारतीय शहर की तरह रांची की सड़कें पंडालों में उमड़े लोगों से पटी पडी थीं। मेन रोड तो अमूमन जाम ही रहता है पर उस दिन चींटी की बांबी सरीखे दिख रहा था। कदम-कदम पर पंडाल और उनसे आता कर्कश संगीत कान के परदे भेद रहा था। इसी बीच अटके ट्रैफिक में दाढ़ी-टोपी वाले उम्रदराज व्यक्ति स्कूटर के पीछे छोटी बच्ची को बिठाए दिखे। उनके झुके हुए चेहरे पर डर, खीझ और गुस्से के मिले-जुले भाव थे। शायद उस क्षण वह अपने ही देश में “बाहरी” थे। (तब तक शायद उन्हें मेरे द्वारा देखे जाने की भनक लग गई। चेहरे पर उसी भाव के साथ उन्होंने मेरी ओर देखा और मैं अपने ही भीतर सिकुड़-सा गया। ऐसा अनुभव हिंद1ओं को कम ही होता है। मेरी मां मुहर्रम के दिन “ध्यान” से रहने को कहती है। तो क्या एक “मुस्लिम मां” “हर दिन” अपने बेटे को “ध्यान” से रहने को कहती होगी? उस क्षण मात्र में विचारों का समंदर था। मुझे अपने धर्म के आयोजनों में शामिल न होने को ले कर इतनी ग्लानि कभी नहीं हुई थी। शामिल न होने की ग्लानि, क्योंकि उसमें कोई भी सकारात्मक बदलाव लाने की सम्भावना जाती रही।

चीजें कितनी तेज़ी से बदल रही हैं और सनातन तो जैसे विलुप्त ही हो चुका है। धर्म को दशकों का मुगल शासन इतना खंडित नहीं कर पाया जितना हिंदुत्व  के ठेकेदारों ने चंद वर्षों में कर दिखाया। मुस्लिम शासकों द्वारा सनातन धर्म पर प्रचुर आघात किए गए, लेकिन तब भी हिंदु धर्म आज तक जीवित है। जब क्रूरतम अन्यायी भी धर्म की बुनियाद नहीं हिला पाए तो फिर आज किस बात का डर है? क्यों आज बात-बात पर हिंदु खतरे में आ जाते हैं? आज तो शासक के हाथ में हिंदुत्व का परचम है और आसमान छूती आबादी भी!

इस्लाम विरोधी सोच का अंकुर दरअसल गलत डाटा से उपजा है! मुस्लिम समाज के संदर्भ में हमेशा मिडिल-ईस्ट (अरब) देशों का ज़िक्र आता है पर सच्चाई यह है कि वहां कुल मुस्लिम आबादी का 15% से भी कम हिस्सा बसता है। दुनिया के 60 फीसद मुसलमान दक्षिण-पूर्व एशिया में रहते हैं न कि अरब देशों में। इंडोनेशिया में विश्व में सबसे ज़्यादा (22 करोड़ 90 लाख) मुस्लिम आबादी रहती है। उसके बाद पाकिस्तान में (20 करोड़ 77 लाख) और तीसरे नम्बर पर भारत है जहां 19 करोड 50 लाख मुसलमान रहते हैं।

दूसरा गलत डाटा दिया जाता है मुस्लिम समाज की आपराधिक प्रवृत्ति पर। तो यह जान लें कि ग्लोबल पीस इंडेक्स 2019 के मुताबिक इंडोनेशिया 41वें स्थान पर है जबकि भारत 141वें स्थान पर! शांति के साथ-साथ सम्पन्नता में भी इंडोनेशिया हमसे बेहतर कर रहा है। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक भारत में हर 5 में से 1 व्यक्ति गरीबी का शिकार है जबकि इंडोनेशिया में केवल 10 में से 1। यह भी बताना ज़रूरी है कि भारत में धर्म के आधार पर कोई आपराधिक डाटा नहीं इकट्ठा किया जाता है। इससे जुड़े भी कई झूठ लगातार वाइरल होते हैं। ऐसे देखें तो भारत के इस नए हिंदुत्व का सम्बंध सनातन धर्म के मुकाबले मिडिल-ईस्ट के रैडिकल इस्लाम से ज़्यादा लगता है। वहां भी भोले-भाले लोगों को झूठ के आधार पर बरगलाया जाता है, बताया जाता है कि उनका धर्म खतरे में है और यहां भी। वहां का नैरेटिव इस्‍लामिक स्टेट के इर्द-गिर्द घूमता है और यहां हिंदु राष्ट्र के। हर धर्म के एक्‍सट्रीमिस्‍ट विचार कि दिशा विनाश की ओर ही रही है और हिंदुत्व की भी उस ओर ही मुड़ चली है।

ऐसा अचानक नहीं हुआ है। हमें तो तब ही आगाह हो जाना चाहिए था जब हमारे धर्म की री-पैकेजिंग हो रही थी। उस दौर में कई बुद्धिजीवियों ने बिगुल बजाए थे पर हमने उन्हें अनसुना कर दिया। इस री-पैकेजिंग के दौरान देवताओं का कलात्मक चित्रण बदला जाने लगा। इससे जो देव-कला उभरी उसमें न मासूमियत थी न कृपादृष्टि। इस तरह के चित्रण में चेहरा गुस्सैल और क्रूर दिखता है। इन्हें देख कर भ्रम होता है कि महादेव अब ध्यान नहीं करते, उन्होंने जिम जाना शुरू कर दिया है और गांजा भी खूब पीते हैं। पवनपुत्र हनुमान का क्रुद्ध चित्र अब गाडि़यों की शोभा है जिसे देख कर लगता है मानो पीछे वाले चालक को कह रहे हों – पीछे ही रहो वरना ‘लिंच’ कर दिये जाओगे!

अगर आपको करोडों लोगों को नया शब्द सिखाना हो तो आप इसे कितना कठिन मानते हैं? वह आबादी जो एक नहीं बल्कि तीन पीढि़यों से बनी है और जिसमें काफी लोग अशिक्षित हैं, उसे एक साथ एक नया शब्द सिखाना बहुत कठिन है, लगभग असम्भव। लेकिन इसके बनिस्बत पूरा देश नये शब्द सीख रहा है। चाहे भीड़ द्वारा की गई हत्या के लिये प्रयुक्त “लिंच” शब्द हो, या सीमा पार छुप कर किए गये हमले के लिये प्रयुक्त “सर्जिकल स्ट्राइक”। इन शब्दों के प्रयोग करने पर जैसे असर हल्का मालूम पड़ता है। डांसिंग… प्लेइंग… लिंचिंग? सोचने लायक बात यह भी है कि ये शब्द एक ही समय पर देश भर की ज़बान पर कैसे आ जा रहे हैं? क्या यह संयोग मात्र है या किसी साजिश के तहत केंद्रीकृत तरीके से हो रहा है?

इन सबके साथ धार्मिक संगीत भी बदला है। अब अनुराधा पौडवाल और गुलशन कुमार कहीं नहीं सुनाई देते। मधुरता को कुचलने हर जगह बड़े-बड़े स्पीकर आ गये हैं। घर के बगल से गुजर जाएं तो कुछ देर तक सीने की धड़कन स्पीकर के समक्ष नतमस्तक हो जाती है। कैसे हमारे कुछ भाई इस शोर में आनंद की अनुभूति तलाश रहे हैं? क्या यही हमारे समाज की सच्ची अभिव्यक्ति है?

हिंदुत्व पर बात हो और गौ हत्या पर नहीं ऐसा कैसे सम्भव है? हमारी गौ माता तो अनादि काल से ही हिप्पोक्रेसी का शिकार हैं। माता बोल कर हम गाय का दूध चुरा लेते हैं और बछ्ड़े का हक मारा जाता है। पर जिस देश में इंसानों को भोजन नसीब न हो वहां बछ्ड़ों की फि़क्र कौन करे? यूएन फूड एंड एग्रिकल्‍चरल ऑर्गनाइज़ेशन के मुताबिक भारत में बीफ की खपत विश्व में सबसे कम है, वह भी तब जब मुस्लिम आबादी में हम तीसरे स्थान पर हैं। खुद प्रधानमंत्री ने अपने एक इंटरव्‍यू में कहा है कि बीफ के कारोबार के लिए किसी एक समाज को निशाना बनाना ठीक नहीं। पर उन्हीं की सरकार के मंत्री जयंत सिन्हा ने मॉब लिंचिंग के आठ अभियुक्तों को फूल मालाएं पहनाईं। यह बात और है कि बाद में अफसोस भी जता दिया।

एक ओर जहां देश में गौ हत्या के भ्रम मात्र पर इंसानों की हत्या हो जाती है वहीं इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते की मोदी राज में भारत बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक बना। आज भी हम बीफ एक्सपोर्ट में विश्व में दूसरा स्थान रखते हैं। यह दोनों बातें एक साथ देखने पर बड़ी ही विचित्र लगती हैं। दूसरी ओर गौ शालाओं में रह रही गायें अगर बोल पातीं तो केवल इच्छा मृत्यु मांगतीं। इस बात का खुलासा भी कई रिपोर्टों में किया गया है। तो फिर यह गौरक्षकों की मूढ़ता है या राजनीतिक स्वार्थ? आप खुद समझ सकते हैं।

सांस्कृतिक लिहाज़ से रंगों का भी का अपना महत्व रहा है। अब उसे भी हिंदुत्व के अनुरूप ढाला जा रहा है। हर सनातनी को भगवा और ऑरेंज के बीच का फर्क पता होना चाहिए। अखाड़ों के सन्यासियों के वस्त्रों का रंग भगवा होता है। वह आंखों में चुभता नहीं बल्कि उसे देखने पर गरमाहट की अनुभूति होती है। परंतु आज नियॉन-ओरेंज को भगवा बना कर प्रचलित किया जा रहा है। इसके अपने खतरे हैं।

चटख रंगों से व्याकुलता उत्पन्न होती है और अगर वही रंग एक पार्टी विशेष से जुड़ा हो तो धर्म और राजनीति का फर्क करना मुश्किल हो जाता है। जब सब तरफ ऑरेंजधारी हों तो हिंदुओं के समारोह और पार्टी समर्थकों की रैली में कैसे अंतर स्थापित किया जाए?

इसी बीच भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी एक दिन के लिये ओरेंज-मय नजर आई। इसे खूब ट्रोल किया गया। कहीं यह भी कंडीशनिंग प्रोग्राम का हिस्सा तो नहीं? याद करिए एग्ज़िट पोल के नतीजों को। 300 से अधिक सीटें भाजपा को जाते देख कर सभी चौंके, पर इससे हुआ यह कि असल परिणाम आने पर कोई विवाद नहीं हुआ जबकि विवाद की सम्भावनाएं पर्याप्त थीं- ईवीएम, वीवीपैट, निर्वाचन आयोग के रवैये से लेकर गिनती तक। तो पूरी सम्भावना है कि धर्म का राजनीतिकरण करने वाले स्वार्थी दानव आने वाले समय में टीम इंडिया की जर्सी का रंग हमेशा के लिये ओरेंज करना चाहेंगे। और तब आप कोई विरोध भी नहीं सुनेंगे क्योंकि मामले को आपके ज़ेहन में हल्का किया जा चुका है!

शिक्षा में राजनीतिक पैठ होने से शहीद-ए-आज़म भगत सिंह को भी किताबों से बाहर किया जा चुका है। आधुनिक भारत के युवाओं के लिये उनसे बड़ा आदर्श कौन हो सकता है? युवाओं से इंकलाब की विरासत छीनी जा रही है और उग्र हिंदुत्व की परिभाषा बताई जा रही है। लेकिन इसके लिये पिछली सरकारें कम दोषी नहीं हैं। फर्क बस इतना है कि उनकी दवा की शक्ति अब कई गुना बढ़ा दी गयी है। उत्तर प्रदेश इसमें उचित कारणों से अग्रणी बना हुआ है। केंद्र से लेकर राज्य तक हर जगह विपक्ष को सांप सूंघ गया है जो लाज़िमी भी है। किसे पता कि सरकारी मशीनरी का कौन सा गेअर कब दबा दिया जाए और नेता जी तिहाड़ को चल पड़ें। नेताजी दूध के धुले तो हैं नहीं! जो दूध के धुले हैं उनके लिए भी अलग से व्यवस्था है।

ऐसे में सनातन धर्म के लोगों को चाहिये के वे खबरों पर पैनी नज़र रखें। समझें कि किस बात के तार कहां जुड़ रहे हैं। सनातनियों का सही मार्ग “युनिवर्सल” है। ऐसा कतई नहीं हो सकता कि “जो कल सही था वह आज गलत हो जाए” या “कल का गलत आज के लिये सही हो जाए”। हिंदू चरमपंथी कभी नहीं रहे बल्कि सेक्युलर होना ही हिंदुओं की पहचान है। उसे गाली न बनने दें।

आभार।

Author is a voracious reader and an autodidact. He is studying Statistics and Philosophy and works as an Analytics Consultant. He has published columns on Public Policy, Governance, Politics, Economics and Philosophy among others. When in leisure he listen's to 70's rock and engage in pro-people talk. He can be contacted on surya@columnist.com

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