Democracy

क्या करना है?

Alain Badiou की किताब “What is to be done” का अनूदित अंश 

मैं ऐसा मानता हूं कि साम्यवाद का ऐतिहासिक अनुभव, जो संयोगवश बहुआयामी और खंडित था, साम्यवादी विचारधारा के विरुद्ध निर्णायक तर्क प्रदान नहीं करता । उन अनुभवों को साम्यवादी विचारधारा का हिस्टॉरिकल ट्रायल मानने का कोई कारण नहीं है । हम 1917 से 1989 के बीच के सत्तर सालों में हुई घटनाओं के बारे में बात कर रहे हैं । सत्तर साल, यह तो स्पेनी धर्माधिकरण से भी कम समय है, जिसमे ईसाई विश्वास के साथ कई असंगत चीजों का भी प्रयोग हुआ, लेकिन उस अनुभव को कभी भी ईसाई धर्म को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया । इतिहास का उपयोग विचार को हमेशा के लिए अयोग्य ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता ।

मेरे दृष्टिकोण में तीन चरणों के बीच भेद करना जरूरी है । पहला उन्नीसवीं सदी का साम्यवाद है, जब यह विचार मार्क्स और अन्य लोगों द्वारा तैयार किया गया था । दूसरा बीसवीं सदी का साम्यवाद है, जब, इस विचार को राज्य के नियंत्रण में, व्यवहार में लाया गया, यह कमजोर या विकृत था । हमें इस विकृति के अपने आकलन को लिखने की जरूरत है, और इससे प्राप्त सबक को एक वाक्य में अभिव्यक्त किया जा सकता है: साम्यवाद एक बहुत भव्य विचार है जिसे राज्य को नहीं सौंपा जा सकता । जैसा कि मार्क्स ने स्वयं कहा, साम्यवाद का समग्र स्वभाव एक राज्य की शक्ति के तरीकों, अस्तित्व और विकास के साथ असंगत है जो इसके विद्रोही, क्रांतिकारी और हिंसक मूल के कारण सैन्यीकृत और निरंकुश हो जाता है । अंत में, अवधिकरण का तीसरा चरण है (अवधिकरण अतीत को समय के ब्लॉक में वर्गीकृत करने की प्रक्रिया है। यह आमतौर पर इतिहास के अध्ययन और विश्लेषण की सुविधा के लिए किया जाता है)। यह  एक नया अनुक्रम है जो इक्कीसवीं सदी में शुरू हो कर अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है । हम एक चौराहे पर, महान उत्तेजना की अवधि में हैं जो 1840 के दशक की याद ताजा करती है । इस सामान्य संदर्भ में, जैसा कि अक्सर होता है, एक नई छलांग लगाने के लिए एक बहुत बड़ा कदम पीछे लेने की जरूरत है । इसका मतलब है – मूल साम्यवाद में वापस जाना और विचार की बुनियादी विशेषताओं को उबारना ताकि इसे आधुनिक दुनिया के लिए उचित रूप से अनुकूलित किया जा सके । अब पहले से कहीं अधिक, हम कर सकते हैं, हमें करना चाहिए, और हम कम्युनिस्ट परिकल्पना को फिर से सक्रिय करेंगे ।

मैं शब्द “परिकल्पना” को एक तकनीकी अर्थ दे रहा हूँ, जो उसके लिए ज्ञान पद्धति में प्रयुक्त अर्थ के समान है । एक परिकल्पना, इस उदाहरण में, मन की एक काल्पनिक धारणा नहीं है बल्कि एक विश्वसनीय आविष्कार है । “परिकल्पना” प्रयोगात्मक अर्थ में, विचार की एक सामान्य योजना है जो ठोस अनुभवों को जन्म देती है और इस प्रकार धीरे-धीरे सन्निहित और सत्यापित की जा सकती है । यह अर्थ बारीकी से मेरी संस्कृति का एक और हिस्सा रही मेरी उग्रवादी प्रतिबद्धता के समान है । कम्युनिस्ट परिकल्पना, इस प्रकार विचार द्वारा प्रदान की गई एक योजना से बाहर की संभावना और परीक्षण को संदर्भित करती है – कम्युनिस्ट विचार को ।

सबसे पहले, “साम्यवाद” उस विश्वास का नाम है कि पूंजीवाद की बुरी पकड़ से पूरी मानवता को छुड़ाना संभव है । निजी संपत्ति का महत्व, प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न अनियंत्रित क्रिया, आर्थिक गतिविधि के एकमात्र कानून के रूप में लाभ, आर्थिक और वित्तीय एकाधिकार – इन सभी राक्षसी प्रवृत्तियों ने असमानताओं को जन्म दिया है और इन्हें नकारा नहीं जा सकता । हम एकदलीय समाजों की रोग प्रकृति के बारे में बात कर रहे थे, लेकिन क्या वर्तमान नवउदारवादी दुनिया उतनी हीं रोगी नहीं है? आज दुनिया की 10% आबादी के पास 86% संसाधन हैं । दुनिया की आबादी का 1% उन्हीं संसाधनों के 46% का मालिक है । वे सरकारी आंकड़े हैं, और वे आगे बढ़ते रहेंगे । क्या इस तरह की दुनिया सहनीय है? नहीं । इसे स्वीकार करना प्रश्न से बाहर है ।

“पूंजी के घातक नियंत्रण से सामूहिक मुक्ति” साम्यवाद की परिभाषा का पहला स्तर होगा ।

दूसरा, “साम्यवाद” की परिकल्पना दर्शाती है कि “राज्यसमाज से अलग, बलपूर्वक स्थापित तंत्र है, लेकिन समाज द्वारा राज्य को अपने अस्तित्व को बचाए रखने और विस्तार करने की अनुमति है, पर यह मानव समाज की संरचना का एक प्राकृतिक, अपरिहार्य रूप नहीं है । हम इसके बिना कर सकते है और हमें इसके बिना करना चाहिए । यह शास्त्रीय मार्क्सवादी परंपरा में राज्य के पतन की धारणा से जुड़ा है ।

तीसरा, “साम्यवाद” का अर्थ है किसी भी आर्थिक उत्पादन के आयोजन के लिए श्रम का विभाजन (विभाजन – क्रियान्वयन और प्रबंधन के कार्यों के बीच, शारीरिक और बौद्धिक श्रम के बीच) लेकिन यह एक बिल्कुल जरूरी हो ऐसा नहीं है ।

अगर इन तीन बिंदुओं को संयुक्त किया जाए तो ये वर्तमान तक, मानव इतिहास के विकास के लिए एक व्यापक विकल्प बनाते हैं । इस प्रकार, “साम्यवाद”, ऐतिहासिक प्रक्रिया के माध्यम से इन तीनों आयामों के एकीकरण की संभावना को निरूपित करेगा: उत्पादन प्रक्रिया का विमुद्रीकरण, राज्य का पतन और श्रम का एकीकरण और बहुरूपता ।कम्युनिस्ट विचार के लोगों की यह विशेषता है की वे अगले कदम पर संवाद करने की क्षमता रखते हैं । यह एक सामरिक मुद्दा है, कम्युनिस्टों की जिम्मेदारी है की वे बताएं की तत्कालीन भविष्य किस तरह का होगा । यह उनका काम नहीं है की वे आने वाले स्वर्ग के महान उत्साही दृश्यों को पेश करें या हर अवसर पर आदर्श समाज की अवधारणा आगे पकड़े रहें, जो कभी नहीं आ सकता. . . चलो इस सब को यूटोपियन  काल्पनिकता के लिए छोड़ दें । नहीं, कम्युनिस्टों को यह परिभाषित करना चाहिए कि वर्तमान स्थिति के संबंध में कौन से राजनीतिक रूप संभव हैं । अगर हम अगले कदम की एक विश्वसनीय तस्वीर पेश करने में विफल रहते हैं तो हर क्रांतिकारी आंदोलन एक डेड एंड पर समाप्त होगा ।

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Date Written: 19-01-2021
Author: Gorica Orsholits
Translator: Surya Kant Singh
Title: What is to be done?
First Published: Dissent.Art

Author is a voracious reader and an autodidact. He is studying Statistics and Philosophy and works as an Analytics Consultant. He has published columns on Public Policy, Governance, Politics, Economics and Philosophy among others. When in leisure he listen's to 70's rock and engage in pro-people talk. He can be contacted on surya@columnist.com

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