Judiciary

अर्थार्थ : सत्य की जीत के रास्ते में ‘बड़ा षडयंत्र’ क्या है?

एक आम आदमी को भारतीय न्यायालयों पर जितना भरोसा है उतना किसी भी अन्य संस्था नहीं। यह एकमात्र ऐसी संस्था है जिसने मुश्किल दौर में भी क्रांतिकारी फैसले लेकर आम अवाम को सशक्त किया है। हमारे न्यायालयों ने न सिर्फ लोकतंत्र को बचाया है बल्कि संविधान में लोगों के विश्वास भी इन्हीं की बदौलत जीवित है। आज भी जब कमज़ोर को दबाया जाता है तो दबे स्वर में ही सही, वह कोर्ट जाने की धमकी देता है। यह भारतीय न्यायालयों पर हमारा विश्वास हीं है जो हमें ढांढस बंधाता है कि शासक के अन्यायी होने पर भी हम यहां न्याय की गुहार कर सकते हैं, चाहे उसमें कितनी भी देर क्यों न हो, हमें न्याय मिलता है।

हालिया फैसले हालांकि हमारे इस विश्वास को डिगा रहे हैं और साफ बता रहे हैं कि न्यायालय अपने कर्तव्यों से विमुख हो चुके हैं। चूंकि भारत के मुख्य न्यायाधीश भारत की न्यायपालिका और भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख होते हैं, साथ ही उनके प्रशासनिक कार्यों को भी संचालित करते हैं इसलिए संस्थागत अखंडता की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं की होती है।

सर्वोच्च न्यायालय में पिछला हफ्ता अप्रत्याशित रहा। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने जहां एक ओर अनुराधा भसीन के कश्मीर में प्रेस पर पाबंदी की याचिका और ईनाक्षी गांगुली एवं शांता सिन्हा की कश्मीर में बच्चों को हिरासत पर रखने की याचिकाओं को सुनने से इनकार कर दिया वहीं यह टिप्पणी भी की कि उनके पास कश्मीर के लिए टाइम नहीं है, वे अयोध्या के मामले की सुनवाई करेंगे। इसके साथ हीं कई महत्वपूर्ण याचिकाओं को 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ और जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट को रेफर कर दिया।

एक अन्य फैसले में गोगोई सोमवार को मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा की याचिका की सुनवाई से हट गये। भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में गौतम ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। कोर्ट ने गौतम के खिलाफ एफआइआर रद्द करने से मना कर दिया था। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले को उस बेंच को भेजा जाए जिसमें वह पार्टी न हों। अब यह मामला जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की बेंच को भेजा गया है।

तीसरे मामले में गोगोई ने मद्रास हाई कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस वीके ताहिलरमानी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर सीबीआई को जांच करने के लिए “फ्री हैंड” दिया है। जांच दो फ्लैट खरीदने को लेकर हो रही है। इस मामले पर आइबी ने पांच पन्ने की रिपोर्ट बनाई है। ईमानदार छवि वाली ताहिलरमानी ने पिछले दिनों अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उनका यह कदम सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम द्वारा मेघालय उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के प्रस्ताव के विरोध में माना जा रहा है। ताहिलरमानी उस पीठ की अध्यक्षा थीं जिसने गुजरात दंगों से संबंधित बिलकिस बानो मामले में सजा सुनायी थी।

अब गोगोई को यह कौन बताये कि कश्मीर हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई असम्भव है? वहां सार्वजनिक परिवहन ठप है और वकील या तो जेल में हैं या घर में कैद। कश्मीर में कैद बच्चों के विरुद्ध राम मंदिर एक प्राथमिकता कैसे हो सकती है? मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा की याचिका पर सुनवाई से वह किस वजह से किनारा कर रहे हैं? मद्रास हाई कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस वीके ताहिलरमानी द्वारा दो फ्लैट खरीदना इतना बड़ा भ्रष्टाचार हो गया जबकि उससे कहीं ज्यादा मौद्रिक मूल्य के मामलों में न्यायालय क रुख लचर है? यह इतिहास में पहली बार होगा कि सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआइ को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ मुक़द्दमा दर्ज करने की दी अनुमति दे दी।

कभी जस्टिस चेलामेश्वर की आड़ लेकर सुप्रीम कोर्ट को खतरा बताने वाले और महिला कर्मचारी के यौन उत्पीड़न के आरोप पर खुद जज बनकर फैसला सुनाने वाले और खुद को निर्दोष बताने वाले गोगोई ऊपर दिये गए फैसलों के मद्देनजर अब पूरी तरह सरकार के कार्यवाहक के रूप में दिख रहे हैं।

1954 में जन्मे जस्टिस गोगोई 28 फरवरी, 2001 को गुवाहाटी उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त हुए और 23 अप्रैल, 2012 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत हुए। न्यायमूर्ति गोगोई की अगली सीजेआइ के रूप में उनकी नियुक्ति खतरे में आ गई थी जब न्यायमूर्ति गोगोई सहित चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने एक अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विभिन्न मुद्दों, विशेषकर बेंचों को मामलों के आवंटन के तरीके पर जस्टिस मिश्रा की आलोचना की थी। । जस्टिस जे चेलामेश्वर, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ उन लोगों में से थे जिन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया जो शायद भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार हुआ था।

इसके बावजूद उन्होंने 3 अक्टूबर 2018 को भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ग्रहण किया। इसके बाद भी न्यायाधीश के रूप में वह हमेशा कर्तव्यपारायण ही दिखे। सर्वोच्च न्यायालय आते ही उन्होंने “नो लीव पालिसी” के तहत सभी न्यायाधीशों को न्यायालय के कार्य दिवसों के दिन छुट्टी न लेने के लिए आगाह किया। न्यायालय में कार्यबल की कमी और लम्बित मुक़द्दमों पर भी उनकी टिप्पणियां आती रहीं पर जब से उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया, शायद तब से ही उनकी न्यायिक क्षमता में अचानक बदलाव दिख रहा है।

यौन उत्पीड़न मामला

सर्वोच्च न्यायालय की एक जांच कमेटी ने अप्रैल महीने में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न मामले पर फैसला सुनाया कि आरोपों में “कोई तथ्य” नहीं था। फैसले के साथ यह भी कहा गया कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाएगी।

मुख्य न्यायाधीश पर लगे आरोपों पर फैसले के एक दिन बाद सुप्रीम कोर्ट में 50 से अधिक महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी महिलाओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। महिलाएं आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर राजधानी दिल्ली में अदालत के बाहर एकत्र हुई थीं। उनकी मांग थी कि एक नई जांच हो और रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह ने भी अदालत से रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की, साथ ही इस फैसले को ट्विटर पर “घोटाला” बताया। इस तरह यह पूरा प्रकरण न्याय के मखौल के रूप में समाप्त हो गया। यहां इंदिरा जयसिंह की टिप्पणी-“न्याय का मखौल” अतिशयोक्ति नहीं है। इसे समझने के लिये पूरे प्रकरण को सिलसिलेवार तरीके से देखना ज़रूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व कर्मचारी ने यौन उत्पीड़न और उत्पीड़न पर 29-पृष्ठ का हलफनामा दाखिल किया था जो काफी विस्तृत है। अपने हलफनामे में, महिला ने कथित उत्पीड़न की दो घटनाओं का वर्णन किया था। उसने आरोप लगाया था कि 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में न्यायमूर्ति गोगोई के घर के कार्यालय में काम करने के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने उसका यौन उत्पीड़न किया।

एफीडेविट के मुताबिक गोगोई ने उसके परिवार से कहा कि “अगर वे किसी को बताएंगे तो बहुत परेशान हो जाएंगे” जिसके बाद उसके परिवार ने मामले को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। महिला ने यह भी बताया कि उसे उसकी “यौन प्रगति” के लिए फटकार लगायी गयी और सेवा से हटा दिया गया। उसे बरखास्त करने के पीछे “आधे दिन की छुट्टी” और “बैठने की जगह में बदलाव” आदि कारण बतलाये गये। उसने दावा किया कि उसके पति और देवर दोनों दिल्ली पुलिस में हेड कांस्टेबल थे। उन्हें 2012 के एक आपराधिक मामले, जिसे परस्पर सुलझाया जा चुका था, में निलंबित कर दिया गया। दिसंबर में निकाल दिए जाने से पहले उसे तीन बार स्थानांतरित भी किया गया था।

उसके हलफनामे के आधार पर आरोपों को समाचार पोर्टलों द्वारा शीर्ष अदालत के 22 न्यायाधीशों को भेजा गया था।

मुख्य न्यायाधीश ने आरोपों से इनकार किया। गोगोई ने बाद में सुप्रीम कोर्ट की एक विशेष पीठ को बताया कि इन आरोपों के पीछे बड़ी ताकतें थीं जो न्यायपालिका को अस्थिर करने की कोशिश कर रही थीं। यह दावा करते हुए उन्होंने कहा कक वह इन आरोपों का जवाब देने के लिए नीचे नहीं गिरना चाहते।

घटनाक्रम

SC ने मामले को “न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर डालने वाला” और “सार्वजनिक महत्व का” माना। अदालत में औपचारिक रूप से शिकायत मिलने के बाद आयोजित “असाधारण सुनवाई” के दौरान, सीजेआइ ने आरोप लगाया कि पीड़ित महिला की आपराधिक पृष्ठभूमि थी और यह मामला न्यायालय को अस्थिर करने की साजिश थी। एक अन्य न्यायाधीश ने कहा कि आरोप निराधार थे।

अप्रैल 19

कथित उत्पीड़न का विवरण देने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों पर गौर करने के लिए दो महिलाओं सहित तीन न्यायाधीशों के साथ एक “इन-हाउस कमेटी” गठित की। यौन उत्पीड़न के आरोपों पर कार्रवाई करने वाली ये इन-हाउस कमेटी अदालत द्वारा नियुक्त न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) एके पटनायक द्वारा की गई जाँच से अलग है। महत्वपूर्ण बात यह रही कि पारित हुए अंतिम आदेश पर सुनवाई में बैठे तीन में से केवल दो न्यायाधीशों के हस्ताक्षर थे।

अप्रैल 23

जस्टिस बोबडे ने बताया कि इन-हाउस प्रक्रिया में पक्षकारों की ओर से अधिवक्ताओं के प्रतिनिधित्व पर विचार नहीं किया जाएगा साथ ही यह भी कि यह “औपचारिक न्यायिक कार्यवाही” नहीं थी और जांच को पूरा करने के लिए “कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं” थी। कार्रवाई का तरीका “जांच से बाहर और गोपनीय” रखा गया।

अप्रैल 25

न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा को समिति में नियुक्त किया गया।

अप्रैल 26

पहली कार्यवाही पैनल में दो महिला जज – जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​और इंदिरा बनर्जी भी शामिल हुईं और केवल शिकायतकर्ता मौजूद थी। उसे वकील को साथ ले जाने की अनुमति भी नहीं दी गई।

दूसरी कार्यवाही न्यायमूर्ति एसए बोबडे की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पैनल के समक्ष हुई जो लगभग तीन घंटे तक चली। कार्यवाही में महिला ने अपना बयान दर्ज कराया। महिला को बताया गया था कि उसकी खुद की गवाही को एक बार दर्ज होने के बाद उसे नहीं दिया जाएगा क्योंकि पूछताछ गोपनीय है। समिति द्वारा जांच शुरू किए जाने से पहले उसने प्रक्रिया से सम्बंधित दिशानिर्देश मांगे, लेकिन उसकी भी आपूर्ति नहीं की गई। शिकायतकर्ता को भी नहीं पता कि किन सबूतों पर विचार हुआ और उसके आरोपों पर क्या जवाब दिया गया और रिपोर्ट को न्यायिक तौर पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

लेकिन अगर यह भी मान लिया जाए कि महिला के आरोप पूरी तरह से निराधार हैं, तो भी उसके पास नियत प्रक्रिया का संवैधानिक अधिकार है। सीजेआइ अपने ही ऊपर दायर आरोपों पर न्यायाधीश कैसे बन सकते हैं ? क्या कोई अपने ऊपर दायर आरोपों पर निर्णय दे सकता है? हालांकि पीड़िता के सवाल उठाये जाने पर उन्होंने अपने आप को इस मामले से अलग कर लिया। समिति ने शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति में ही निर्णय का एक हिस्सा पारित किया। यह प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।

एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने खुद माना था कि “इन-हाउस” प्रक्रिया के तहत जांच को शिकायतकर्ता के अधिकारों, संस्था की अखंडता, निष्पक्ष प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए।

1999 में बनी इन-हाउस प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के जजों पर लगे आरोपों की जांच के लिये बस तीन जजों की कमेटी की बात कही गयी है। यद्यपि इस मामले के लिये कोई पूर्व निर्धारित व्यवस्था नहीं है,तब भी ऐसे किसी भी मामले की जांच मूल सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए थी।

मौजूदा व्यवस्था में, जब षड्यंत्र चारों ओर तैर रहे हों, इसमें कोई शक नहीं की इस तरह की शिकायत में हेरफेर कर इसे एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। अदालत के पास ऐसी शिकायतों से निपटने के लिए एक मानक प्रक्रिया होना चाहिये। आरोपों को एक सिरे से खारिज करना समाधान कतई नहीं है।

आदर्श रूप से इस मामले की जांच बाहरी समिति द्वारा की जानी चाहिए थी, लेकिन इसकी भरपाई के लिए अदालत ने समिति में दो महिला न्यायाधीशों को शामिल किया। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने पत्र में लिखा कि महिला को वकील या विश्वस्त मित्र द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने की अनुमति दी जानी चाहिए।

जब यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका ही नहीं कि न्यायपालिका ने मामले में निष्पक्ष निकाय के रूप में कार्य किया, तब न्याय का क्या मतलब रह जाता है? इन परिस्थितियों को देखकर समझ नहीं आता की दिये गये फैसले को न्याय कैसे कहा जाए। यह निश्चित रूप से भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में काला अध्याय है और शायद भारतीय लोकतंत्र के पतन का संकेत भी।

इस पतन के पहले जनवरी 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों द्वारा संवाददाता सम्मेलन में न्यायपालिका की स्वतंत्रता कम करने के प्रयासों पर आगाह किया गया था जिसमें खुद वर्तमान मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई भी शामिल थे। न्यायपालिका से उठी उस कराह को अनसुना करने की कीमत क्या होगी, शायद हम कभी नहीं जान पाएंगे।

हालिया खबर के मुताबिक गोगोई को फंसाने के तथाकथित ‘बड़े षड्यंत्र’ की सच्चाई का पता लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस ए. के. पटनायक ने कहा है कि उन्होंने खुफिया एजेंसियों सीबीआइ और आइबी व दिल्ली पुलिस से कुछ और सूचनाएं मंगवाई हैं। गौरतलब हो कि वकील उत्सव बैंस ने दावा किया था कि सर्वोच्च न्यायालय में ‘बड़े षड्यंत्र’ चल रहे हैं। वकील उत्सव बैंस ने ये आरोप तब लगाए थे जब सुप्रीम कोर्ट सीजेआइ के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की सुनवाई कर रहा था।

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